ये कविता उनके लिये जो सोचते है दिया जलाना पागलपन है
दिया
हर कोई सवाल उठाता है,
क्या होगा दिया जलाने से,
एक मै भी पुछुं,
क्यों जलाया था निर्भया के होने पे?
तुम मुझे खुन दो,
जब कहा था वीर सुभाष ने
क्या तब भी पुछते,
क्या होगा बेवजह खुन बहाने से?
कुछ तो आज बहके हैं
और बहके थे उस लडाई में,
इसलिए न आज सब हिरो है
ना थे उस जमाने में!
बस दिया जलाना था
ना मांगी जान हथेली पे,
कैसे समझायें इन दिवानों को
बस यही पहेली है!
~ दत्ता
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